“Bastar Junction के पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या: सच की आवाज़ को कुचलने की साज़िश?”

पत्रकार की हत्या या सच्चाई का गला घोंटा गया?

"Bastar Junction के पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या: सच की आवाज़ को कुचलने की साज़िश?"
“Bastar Junction के पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या: सच की आवाज़ को कुचलने की साज़िश?”

2025 की शुरुआत एक दिल दहला देने वाली खबर से हुई, जिसने न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश के मीडिया जगत को झकझोर कर रख दिया। 32 वर्षीय यूट्यूब पत्रकार मुकेश चंद्राकर, जो ‘बस्तर जंक्शन’ नाम से एक लोकल यूट्यूब चैनल चलाते थे, की लाश 3 जनवरी को बीजापुर के एक स्थानीय ठेकेदार सुरेश चंद्राकर के घर के सैप्टिक टैंक में पाई गई। वो भी तब, जब टैंक को सीमेंट से ढकने की कोशिश की गई थी। सवाल सिर्फ हत्या का नहीं था, सवाल यह था कि क्या यह पत्रकारिता की कीमत थी?

यूट्यूब चैनल ‘बस्तर जंक्शन’ की पहचान

32 वर्षीय मुकेश का अपना यूट्यूब चैनल था — ‘बस्तर जंक्शन’ जो खासतौर पर बस्तर के दुर्गम नक्सल प्रभावित इलाकों से लाइव रिपोर्टिंग करता था। उनका चैनल करीब 1.67 लाख सब्सक्राइबर वाला था, और कुल व्यूज एक करोड़ के पार थे। 2021 से अब तक उन्होंने 486 वीडियो अपलोड किए थे — जिसमें हालिया वीडियो (23 दिसंबर) में वे एक नक्सली घटना की रिपोर्ट कर रहे थे।

मुकेश स्वतंत्र पत्रकार थे – कभी-कभी मैनस्ट्रीम मीडिया के लिए स्ट्रिंगर के तौर पर काम भी करते थे।

bastar junction
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लापता से सनसनी तक: हत्या की कहानी

ठेकेदार सुरेश चंद्राकर ने 1 जनवरी को उन्हें अपने घर बुलाया था, जिसके बाद से मुकेश लापता हो गए। उनके भाई और अन्य स्थानीय पत्रकार तीन दिन तक खोजते रहे, जिसपर पुलिस को तहरीर देकर शिकायत की गई। फिर चौथा दिन आया, जब उनकी लाश सैप्टिक टैंक में मिली — उस पर सीमेंट की ताजी परत भी थी।

इस दृश्य ने न सिर्फ पत्रकार जगत बल्कि पूरे इलाके में धड़कनें तेज कर दीं।

हत्या की मोटिव क्यों मानी जा रही है?

जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, तथ्यों ने एक संकेत दिया — हालिया रोड निर्माण परियोजना की खबर (NDTV पर प्रकाशित) जिसमें ठेकेदार पर गड़बड़ी उजागर हुई थी — का विडियो और रिपोर्ट में भी मुकेश सहयोगी भूमिका में थे। शिकारपुर से नेलसनार तक बने सड़क पर भ्रष्टाचार की खबर के बाद ठेकेदार द्वारा बार-बार बुलाया जाना और अचानक desapar हुए एक पत्रकार… संदेह आसमा छू रहा था।

विश्लेषकों का मानना है कि पत्रकारिता की वजह से मुकेश की जान को खतरा बढ़ गया था। उनका योश, सिस्टम की खामियों को उजागर करने की तमन्ना, भ्रष्ट ठेकेदारों को पसंद नहीं आई।

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आदिवासियों की आवाज़ बनी उनकी पत्रकारिता

मुकेश ने अपनी रिपोर्टिंग में आदिवासियों के दर्द और हालात को उजागर किया था — जैसे ‘शवयात्रा यंत्रणा’, ‘टूटा पुल’, ‘नक्सल की छाती पर अमित शाह’ इत्यादि। इनमें झलकता था आदिवासी इलाकों में सरकारी तंत्र की कमी और उनके हक के लिए लड़ने कि सिलसिला।

उनकी यह निर्भीक पत्रकारिता आख़िरकार उनकी जान की कुचलने वाली बनी।

मैनस्ट्रीम मीडिया की स्थिति पर सोच

मुकेश की हत्या ने मैनस्ट्रीम मीडिया की भी पोल खोल दी। चैनलों की क्रांति से संस्थागत पत्रकारिता से दायरा घटा है, वही मोबाइल पत्रकारिता को मौका मिला है। लेकिन विषमता यह कि अब खबर व्यूज और ट्रैफिक की रेस में चल रही है – तथ्य नहीं, शोर ज्यादा देखा जा रहा है।

जब संपादक की नहीं सुनती चैनल की मीडियाकानून, तब उठता सवाल: सिस्टम पर सवाल नहीं, सिस्टम से जुड़े लोगों पर सवाल।

स्वतंत्र पत्रकारिता की वापसी

मुकेश जैसे पत्रकार ही असली पत्रकारिता का आधार रहे हैं — बिना किसी संपादक के, बिना किसी गाडिखाँच के। उन्होंने सिर्फ कैमरे और आवाज़ को हथियार बनाया — और उसी ने कल उनका अंत तय किया।

यह हत्या अकेली घटना नहीं है, लेकिन यह हमें यह याद दिलाती है कि जोखिम पत्रकारिता की एक हक़ीकत है – खासकर जब सफेदपोश नहीं, फ़ोटो-वीडियो लेकर निकल पड़े। कुर्सियों की नहीं, स्टेटस की नहीं, बल्कि सच की जंग लड़ने वालों को इतना महंगा नहीं चुकाना चाहिए।

जिम्मेदारी सिर्फ प्रशासन की भी नहीं

ठेकेदार आरोपी पर केस दर्ज होने के बावजूद जब प्रशासन में उसके संबंध मजबूत रहे, तो खबरें क्या नतीजा दिखाती हैं — अधिकांश स्वतंत्र पत्रकारियां नक्सलियों और सिस्टम में नीतिगत टूट से जूझ रही हैं।

इसमें न केवल पुलिस, बल्कि प्रशासन, राजनीति और मीडिया की भूमिका भी नजर आती है। उस नाज़ुक कड़ी पर सवाल उठते हैं — क्या सच सामने आने पर सुरक्षा की गारंटी है? क्या अब कथित तौर पर खबर बनाने वाले पत्रकार भी उसी सिस्टम से बेहतर सुरक्षा पा सकते हैं?

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निष्कर्ष

मुकेश चंद्राकर की हत्या पत्रकारिता की सुरक्षा और स्वतंत्रता पर गहरा सवाल है। यह हमें महसूस कराती है कि सिस्टम कितना भी कहे, सच की आवाज़ दबाने का सफ़र लगातार जारी रहा है। बस्तर प्रभावी इलाकों में काम करते हुए उन्होंने सिस्टम से जुड़ी खामियों को उजागर किया — और उसकी कीमत अपनी जान देकर चुकाई।

यह कहानी हमें आत्मावलोकन करने की छूट देती है: क्या सच बोलने वाले को सुरक्षा मिलेगी? क्या स्वतंत्र पत्रकारिता को फिर से संविधि देनी चाहिए? और क्या हम सिस्टम पर सवाल उठाने वाले को केवल व्यूज और लाइक्स से नहीं, बल्कि सम्मान और सुरक्षा से पहचानेंगे?

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