120 बनाम 2000: रेजांग ला के शेर Major Shaitan Singh—रणनीति, साहस और बलिदान की वो कहानी जो भारत को हमेशा याद रहेगी

18 नवंबर—यह तारीख केवल कैलेंडर पर दर्ज एक और दिन नहीं, भारतीय सेना के इतिहास में एक विनम्र प्रणाम है। इसी दिन 1962 में, लद्दाख के चुशुल सेक्टर के पास 16 हज़ार फीट से ऊपर, बर्फ़ और पत्थरों की दुनिया में, 13 कुमाऊं की सी कंपनी ने वह कर दिखाया जिसे आज भी सैन्य अकादमियां उदाहरण की तरह पढ़ाती हैं। कमांडर थे—Major Shaitan Singh। मुश्किल से 120 भारतीय जवान, सामने लगभग 2000 चीनी सैनिक। परिणाम? इतिहास बना। सम्मान अक्षुण्ण रहा। और भारत ने एक अमर नायक पाया—परमवीर चक्र से अलंकृत Major Shaitan Singh।
संयोग देखिए—18 नवंबर उनकी पुण्यतिथि है और इसी प्रसंग पर आधारित फरहान अख्तर की फिल्म “120 बहादुर” 21 नवंबर को रिलीज़ हो रही है। यह केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि स्मरण, कृतज्ञता और नई पीढ़ी को वह कहानी सुनाने का माध्यम है जिसे जानना-समझना हम सबके लिए ज़रूरी है।
बचपन से रणभूमि तक—शख्सियत कैसे बनी
1 दिसंबर 1924 को राजस्थान के जोधपुर ज़िले के बानासर में जन्मे Major Shaitan Singh सैन्य परंपराओं वाले घर में पले। अनुशासन, सादगी और देश-सेवा घर की बोली थी। पिता सेना में थे, इसलिए वर्दी के मायने उन्होंने बचपन से नज़दीक से देखे। बड़े होते-होते उनकी पहचान साफ़ थी—कम बोलने वाले, निर्णय के क्षण में अद्भुत स्पष्टता, और कठिन माहौल में भी स्थिर। उनका सपना सिपाही बनकर नहीं, सैन्य नेतृत्व के साथ देश के काम आना था। भारतीय सेना में आते ही कुमाऊं रेजिमेंट से उनका रिश्ता जुड़ा—वही रेजिमेंट जो आगे चलकर रेजांग ला में अमर गाथा लिखने वाली थी।
कुमाऊं रेजिमेंट और शैतान सिंह—एक जैसा डीएनए
कुमाऊं रेजिमेंट की पहचान है—कठिन इलाक़े, सीमित साधन और फिर भी “नॉन-नेगोशिएबल” हौसला। जवानों में Major Shaitan Singh की छवि एक ऐसे कमांडर की थी जो आदेश देने से पहले खुद उदाहरण बनता है। वही खाना, वही ठंड, वही कंटीली चढ़ाइयां—और अभ्यास के समय सबसे आगे। फायरिंग रेंज में सटीक निशाना, मार्च में मोर्चे के लिये पहली चाल, और हर ब्रीफिंग का एक ही संदेश—“दुश्मन संख्या में बड़ा हो सकता है, मगर दिल से बड़ा नहीं।”

1962—सीमाओं पर तनाव और ऊंचाई का इम्तहान
भारत-चीन रिश्तों में 1962 तक तनाव चरम पर था। सीमांकन अस्पष्ट था, और ऊंचाई वाले इलाकों में सेना आमने-सामने थी। चुशुल सेक्टर के पास रेजांग ला दर्रा रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण था—जो इसे पकड़े, वह गेटवे सुरक्षित रखे। 16,000 फीट से ऊपर—जहां सांस लेना तक मुश्किल, तापमान शून्य से नीचे, हवा बर्फ़-सी, और ऑक्सीजन कम। ऐसी जगह 13 कुमाऊं की सी कंपनी तैनात हुई। कमांड—Major Shaitan Singh । भारी हथियार सीमित, गोला-बारूद समझ-बूझकर इस्तेमाल करना था। वायरलेस संचार भी लगातार भरोसेमंद नहीं। मगर मनोबल? अखंड।
रणनीति—कम संख्या में “फोर्स मल्टीप्लायर”
किसी भी लड़ाई में भूगोल आपकी सबसे बड़ी ढाल बन सकता है, अगर आप उसे पढ़ लें। मेजर शैतान सिंह ने सेक्शनों को इस तरह तैनात किया कि दुश्मन ऊपर चढ़ते ही फायर-लाइन में आ जाए। पत्थरों की आड़, चट्टानों के किनारे, और हर दिशा पर “क्रॉस-फायर” की व्यवस्था—ताकि हमला कहीं से भी आए, जवाब दो दिशाओं से मिले। आदेश साफ़ था—“जब तक साफ़ दिखे नहीं, गोली मत चलाना।” इसका असर यह हुआ कि हर गोली का लक्ष्य सटीक रहा और शुरुआती असॉल्ट में दुश्मन को भारी झटका लगा।
उस रात की खामोशी—और फिर गड़गड़ाहट
18 नवंबर की रात असाधारण रूप से शांत थी। दूर-दूर चीनी पोस्टों की हलचल दिखती थी। मेजर ने अंतिम बार पोज़िशनिंग की समीक्षा की—फायर फील्ड, रिज़र्व गोला-बारूद, घायल होने पर साथी की मदद—सब पर स्पष्ट निर्देश। सुबह से पहले गोले-बारूद की गर्जना शुरू हुई। मोर्टार बर्फ़ीली ज़मीन पर फटे, मशीनगनों की झड़ी लगी। चीनी सैनिकों ने कई दिशाओं से बार-बार घुसने की कोशिश की—कभी बाएं, कभी दाएं, कभी पीछे के घुमावदार रास्तों से। लेकिन हर बार फायर-डिसिप्लिन और क्रॉस-फायर ने उन्हें रोके रखा।
कमांडर की मौजूदगी—सबसे बड़ा संबल
लड़ते-लड़ते अक्सर तय होता है कि युद्ध कौन जीतता है—टैक्टिक्स या स्पिरिट? रेजांग ला में दोनों साथ थे। Major Shaitan Singh मोर्चे से मोर्चे तक दौड़ते—खुले मैदान से होकर, बर्फ़ीली हवा के बीच—सैनिकों का हौसला बढ़ाते, फायरिंग की दिशा ठीक कराते, और बार-बार कहते, “पोस्ट नहीं टूटी तो चुशुल सुरक्षित है।” कई साथी उन्हें सुरक्षित चट्टान की आड़ में रहने को कहते रहे, लेकिन उनका जवाब स्थिर था—“कमांडर पीछे रहेगा तो जवान कैसे टिकेगा?”

गोला-बारूद घटने लगा—फिर भी हिम्मत नहीं
घंटों तक सी कंपनी डटी रही। धीरे-धीरे गोला-बारूद कम हुआ। कई सेक्शन में हालत ऐसी हुई कि सैनिकों ने आख़िरी कारतूस तक इस्तेमाल किया और फिर नज़दीक आने वाले दुश्मन को रोकने के लिए बेयोनट, बट और यहां तक कि पत्थरों का सहारा लिया। बाद में जब मौसम ने साथ दिया और बर्फ़ पिघली, तो कई जवानों के पार्थिव शरीर उसी मुद्रा में मिले जिसमें वे लड़ते हुए शहीद हुए थे—मानो मृत्यु भी उनके हथियारों का रुख़ नीचे न झुका सकी।
Major Shaitan Singh—अंतिम क्षण तक नेतृत्व
एक भीषण मोड़ पर, दुश्मन की मशीनगन से मेजर गंभीर रूप से घायल हुए। साथी उन्हें पीछे सुरक्षित जगह ले जाना चाहते थे। उन्होंने आग्रह के बावजूद कहा—“मुझे ऐसी जगह रखो जहां से मोर्चा दिखे, तुम लोग वापस जाओ और लड़ाई जारी रखो।” बर्फ़ से ढकी जमीन पर, हथियार साथ—उन्होंने वहीं अंतिम सांस ली। महीनों बाद जब इलाके पर दोबारा नियंत्रण हुआ और खोज दल लौटा, तो उनका पार्थिव शरीर अब भी उसी मुद्रा में मिला—कमान संभाले, मोर्चे की तरफ़ चेहरा किए। उनके आसपास बहादुर साथियों के शरीर भी लड़ने की मुद्रा में थे। यह दृश्य केवल सेना का नहीं, पूरे देश का गर्व बन गया।
“120 बनाम 2000”—इतिहास का अर्थ
संख्या और तकनीक के पैमाने पर यह लड़ाई असंभव लगती है—एक कंपनी बनाम दस गुना शत्रु। मगर रेजांग ला ने सिखाया कि:
- सही पोज़िशनिंग = फोर्स मल्टीप्लायर: ऊंचाई, क्रॉस-फायर, और फायर-डिसिप्लिन ने संख्या का लाभ कम किया।
- समय पर निर्णय = दुश्मन की लय टूटी: पहले असॉल्ट में सटीक जवाब ने उनके मनोबल को झटका दिया।
- नेतृत्व = मनोबल का स्तंभ: कमांडर की फ्रंट-लाइन उपस्थिति ने जवानों को आख़िरी पल तक “होल्ड” कराया।
- उद्देश्य की स्पष्टता = पीछे हटना विकल्प नहीं: चुशुल की सुरक्षा, पूरे सेक्टर की मजबूती का प्रश्न थी—सबको यह बात समझ थी।
परिणाम—सम्मान, स्मृति और शिक्षा
इस लड़ाई में सी कंपनी ने मोर्चा छोड़ने से इंकार किया। शत्रु को भारी क्षति पहुँची—ठोस संख्या इतिहास में बहस का विषय रही है, लेकिन यह निर्विवाद है कि रेजांग ला ने दुश्मन की रफ्तार तोड़ दी और चुशुल सेक्टर को “कीमत देकर” सही, पर सुरक्षित रखा। Major Shaitan Singh को मरणोपरांत देश का सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र मिला। रेजांग ला मेमोरियल आज भी उस घाटी में खड़ा है—जहां हवा भी धीमी चलती लगती है, मानो शहीदों की स्मृति को सलाम कर रही हो। हरियाणा-राजस्थान के गांवों—खासकर आहिरवाल बेल्ट—में आज भी यह कहानी बच्चे सुनते-बड़े होते हैं। यह केवल एक गाथा नहीं, पहचान है।
क्यों पढ़ाई जाती है रेजांग ला—रणनीति की कक्षा
सैन्य अकादमियों में रेजांग ला को तीन आयामों में पढ़ाया जाता है:
- मैदान की समझ: आपकी भूगोल-समझ दुश्मन की संख्या को “नीचे” लाती है।
- फायर-डिसिप्लिन: “कब” चलना है, यह “कितनी” गोलियां हैं, उससे अधिक निर्णायक है।
- नेतृत्व का मायना: बैटल-लाइफ में कमांडर की फ्रंट-लाइन मौजूदगी मनोबल का सबसे बड़ा इंजन होती है।
शहीदों के नाम—जो अमर हैं
उन 120 जवानों में अनेक ऐसे थे जिनके नाम आज भी गांव के चौक-चौराहों, स्कूलों और रेजिमेंट के सभागारों में दर्ज हैं। शहरों में शायद हम उनके नाम उतनी बार न पढ़ें, मगर सेना की “रोल ऑफ ऑनर” में वे रोज़ सलामी पाते हैं। यह गाथा हमें बताती है—हिरोइज़्म केवल बड़े संवाद नहीं, ठंडी रातों, जमे हाथों और बर्फ़ीले पत्थरों पर टिके संकल्प से बनता है।
आज की पीढ़ी के लिए सीख
- कठिन समय में धैर्य: बड़ा बदलाव एक ही दिन में नहीं, लगातार साहस से आता है।
- सीमित संसाधन, बड़ा असर: आपके पास सबकुछ न हो, फिर भी जो है, उसे सही जगह लगाइए।
- अपने काम पर गर्व: वर्दी हो या कोई और जिम्मेदारी—जब उद्देश्य साफ़ हो, थकान भी इंधन बन जाती है।
“120 बहादुर”—क्यों ज़रूरी है यह फिल्म
सिनेमा की खूबसूरती यही है कि वह इतिहास को जीवंत बना देता है। “120 बहादुर” उन चेहरों को आवाज़ देगी जिनके नाम अक्सर किताब के फुटनोट में रह जाते हैं। युवा दर्शक समझ पाएंगे कि “देश के लिए जान देना” स्लोगन नहीं, वास्तविक जीवन का निर्णय है—जहां हर सेकंड की कीमत है। यह फिल्म एक पीढ़ी और उस पीढ़ी के बलिदान के बीच पुल बन सकती है—ताकि जब हम “जय हिंद” कहें, तो उसके पीछे की कहानी भी हमारी आँखों में ताज़ा रहे।
Based on a true story that shaped our nation’s history, 120 Bahadur – Trailer out now.
Special thanks to Amitabh Bachchan Sir
एक सच्ची कहानी पर आधारित,
जिसने हमारे देश का इतिहास बदल दिया —
ट्रेलर अब देखिए। pic.twitter.com/JK0ELSr5U5— Excel Entertainment (@excelmovies) November 6, 2025
रेजांग ला—एक स्मरण, एक प्रण
हर साल 18 नवंबर को रेजांग ला मेमोरियल पर चुपचाप श्रद्धांजलि दी जाती है। बर्फ़ीली हवा में लहराता तिरंगा बताता है कि कोई भी मौसम, कोई भी कठिनाई, इस देश के सम्मान से बड़ी नहीं। मेजर शैतान सिंह और उनके 120 वीर साथियों ने जो कर दिखाया, वह केवल सैन्य जीत नहीं—यह भारतीय आत्मा का दस्तावेज़ है। वह आत्मा जो कहती है—“हम संख्या नहीं, संकल्प से लड़ते हैं।”
अंत में
रेजांग ला की कहानी जितनी बार सुनेंगे, उतनी बार नई लगेगी। हर बार एक नई सीख देगी। Major Shaitan Singh का नाम लेते ही मन में एक तस्वीर उभरती है—बर्फ़ीली चट्टान, दूर-दूर तक सन्नाटा, और बीच में स्थिर खड़ा एक कमांडर—जो आख़िरी सांस तक कहता रहा, “पोस्ट नहीं टूटेगी।” और पोस्ट नहीं टूटी। चुशुल सुरक्षित रहा। देश का सिर ऊंचा रहा।

आज यदि हम इस कहानी से एक चीज़ अपने भीतर ले जाएं—तो वह होनी चाहिए साहस के साथ विवेक। हिम्मत, पर संयम। जोश, पर होश। यही Major Shaitan Singh की रणनीति का सार था—और यही उनकी गाथा का संदेश भी है।
