अरावली खतरे में है तो दिल्ली-राजस्थान की सांसें खतरे में हैं – Aravalli Crisis को अब भी बचा सकते हैं

अरावली बचेगी तो जिंदगी बचेगी: उत्तर भारत की सांसों पर मंडराता संकट और बचाव का रास्ता
सामग्री की तालिका
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एक फैसला, करोड़ों लोगों की सांसें दांव पर [परिचय]
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क्या होगा अगर अरावली न रही? [पांच प्रमुख प्रभाव]
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क्या कहती है सरकार? [सरकार का पक्ष]
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बचाव का रास्ता क्या है? [निष्कर्ष एवं समाधान]
एक फैसला, करोड़ों लोगों की सांसें दांव पर
दिल्ली-एनसीआर से लेकर राजस्थान तक, इन दिनों #SaveAravalli हैशटैग के साथ-साथ सड़कों पर भी लोग उतर रहे हैं। विरोध का कारण है सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला, जिसने अरावली पहाड़ियों की एक नई ‘ऊंचाई-आधारित’ परिभाषा स्वीकार की है। इसके मुताबिक, अब सिर्फ वही पहाड़ी अरावली मानी जाएगी जो आसपास की ज़मीन से कम से कम 100 मीटर ऊंची हो।
पर्यावरणविदों का कहना है कि इस ‘100 मीटर के फैसले’ से अरावली के 90% से ज्यादा हिस्से का संरक्षण खत्म हो सकता है, क्योंकि ज्यादातर पहाड़ियां इस ऊंचाई से छोटी हैं। उनका डर है कि इससे खनन, कंस्ट्रक्शन और वनों की कटाई के लिए दरवाजे खुल जाएंगे। 2.5 अरब साल से भी पुरानी इस पर्वत श्रृंखला के साथ छेड़छाड़ सिर्फ पहाड़ों का मामला नहीं, बल्कि चार राज्यों के 29 जिलों में बसने वाले लगभग 5 करोड़ लोगों के जीवन-मरण का सवाल है।

क्या होगा अगर Aravalli न रही? पांच प्रमुख प्रभाव
अरावली को सिर्फ पत्थरों का ढेर मानना भूल होगी। यह उत्तर भारत का प्राकृतिक बचाव कवच, पानी का भंडार और हवा का फिल्टर है। आइए समझते हैं कि अगर यह कमजोर हुई तो हमारा जीवन कैसे बदल जाएगा:
1. रेगिस्तान की दीवार गिरेगी, बंजर होगी उपजाऊ ज़मीन
अरावली थार रेगिस्तान को पूर्व की ओर बढ़ने से रोकने वाली आखिरी प्राकृतिक दीवार है। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अगर यह दीवार कमजोर हुई तो रेगिस्तानीकरण की रफ्तार तेज हो जाएगी। इसका सीधा असर राजस्थान, हरियाणा और यहां तक कि दिल्ली-एनसीआर के इलाकों की उपजाऊ ज़मीन पर पड़ेगा, जो धीरे-धीरे बंजर में बदल सकती है।
2. बारिश कम, सूखा और गर्मी ज्यादा
ये पहाड़ियां मानसूनी हवाओं को रोककर बारिश कराने में अहम भूमिका निभाती हैं। अगर ये नहीं रहीं, तो राजस्थान और दिल्ली-एनसीआर जैसे इलाकों में 20-30% तक बारिश कम हो सकती है। नतीजा होगा लंबा सूखा और भीषण गर्मी। अरावली को दिल्ली-एनसीआर का नेचुरल कूलिंग सिस्टम कहा जाता है; इसके क्षीण होने से शहरी ताप द्वीप प्रभाव (Urban Heat Island Effect) और बढ़ेगा।
3. पानी का संकट गहराएगा
अरावली की चट्टानें प्राकृतिक स्पंज का काम करती हैं, जो बारिश का पानी सोखकर ज़मीन के भीतर रिचार्ज करती हैं। यही पानी दिल्ली, गुरुग्राम, फरीदाबाद, अलवर जैसे शहरों की प्यास बुझाता है। खनन से यह प्राकृतिक व्यवस्था टूटती है, जिससे भूजल स्तर और नीचे चला जाता है और ट्यूबवेल सूखने लगते हैं।
4. दिल्ली की हवा और जहरीली हो जाएगी
Aravalli दिल्ली-एनसीआर के लिए एक प्राकृतिक ‘डस्ट बैरियर’ है। यह पश्चिम से आने वाली धूल भरी आंधियों और प्रदूषक कणों (PM10, PM2.5) को रोकती है। अगर पहाड़ियां कटेंगी तो यह बैरियर टूटेगा और राजधानी का वायु प्रदूषण (AQI) अभी से कहीं ज्यादा खराब हो जाएगा। सांस और फेफड़ों की बीमारियों में भारी इजाफा होने की आशंका है।
5. जैव विविधता और करोड़ों की आजीविका खतरे में
Aravalli सिर्फ पत्थर नहीं, जीवों का घर है। यहां तेंदुआ, स्लॉथ बीयर, नीलगाय जैसे 31 प्रकार के स्तनधारी, 300 से ज्यादा पक्षियों की प्रजातियां और 200 से अधिक किस्म के पेड़-पौधे पाए जाते हैं। इनका आवास नष्ट होना पूरे इकोसिस्टम को तबाह कर देगा। साथ ही, खनन, पर्यटन और वन उत्पादों पर निर्भर लाखों लोगों की आजीविका भी संकट में पड़ जाएगी।
नीचे दिया गया चार्ट दिखाता है कि अरावली के कमजोर होने का अलग-अलग राज्यों पर क्या असर पड़ सकता है:
| राज्य / क्षेत्र | प्रमुख प्रभाव | आबादी प्रभावित (लगभग) |
|---|---|---|
| राजस्थान | रेगिस्तान का विस्तार, पानी का गहरा संकट, कृषि को नुकसान | राज्य की बड़ी आबादी |
| हरियाणा | भूजल स्तर में भारी गिरावट, वायु प्रदूषण में वृद्धि | गुरुग्राम, फरीदाबाद समेत करोड़ों |
| दिल्ली-एनसीआर | वायु गुणवत्ता (AQI) में भारी गिरावट, गर्मी बढ़ना, धूल तूफान | 3 करोड़ से अधिक |
| गुजरात | मिट्टी का कटाव, स्थानीय नदियों का प्रभावित होना | लाखों |
क्या कहती है सरकार? “90% अरावली सुरक्षित है”
इन चिंताओं के बीच केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने स्पष्ट किया है कि नई परिभाषा का मतलब यह नहीं है कि 100 मीटर से छोटी हर जगह खनन की छूट मिल जाएगी।

मंत्री के मुताबिक:
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दिल्ली की अरावली में खनन पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा।
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नई परिभाषा में 500 मीटर के दायरे का प्रावधान है। यानी अगर दो पहाड़ियां 100 मीटर ऊंची हैं और उनके बीच की दूरी 500 मीटर से कम है, तो उस पूरे क्षेत्र को संरक्षित माना जाएगा।
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केवल अरावली के कुल क्षेत्रफल का लगभग 0.19% हिस्सा ही खनन के लिए पात्र हो सकता है, बाकी 90% से अधिक हिस्सा सुरक्षित है।
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राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली – इन चारों राज्यों में सख्त नियम लागू रहेंगे।
हालांकि, पर्यावरण कार्यकर्ताओं का मानना है कि खतरा सीधे फैसले से नहीं, बल्कि उसके गलत इस्तेमाल से है। उन्हें डर है कि जमीन के रिकॉर्ड बदलकर और पर्यावरणीय मूल्यांकन को कमजोर करके संरक्षित क्षेत्रों को भी व्यावसायिक गतिविधियों के लिए खोला जा सकता है।
बचाव का रास्ता क्या है?
तो क्या Aravalli कटेगी या बचेगी? विशेषज्ञ कहते हैं कि अब यह कोर्ट के फैसले से ज्यादा, सरकारों की नीयत और हमारी सामूहिक जागरूकता पर निर्भर करता है।
बचाव के लिए जरूरी है:
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वैज्ञानिक मानक: अरावली को सिर्फ ऊंचाई से नहीं, बल्कि उसके पर्यावरणीय, भूवैज्ञानिक और जलवायु संबंधी महत्व से परिभाषित किया जाए।
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सार्वजनिक भागीदारी: सरकार द्वारा बनाई जाने वाली वैज्ञानिक मैपिंग और प्रबंधन योजना पारदर्शी हो और स्वतंत्र विशेषज्ञों की समीक्षा के लिए खुली हो।
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वैकल्पिक रोजगार: खनन पर निर्भर समुदायों के लिए पर्यटन, वनीकरण और हरित उद्योगों के जरिए वैकल्पिक आजीविका के रास्ते विकसित किए जाएं।
Arnab Goswami speaking up for Aravali and indirectly targeting Adani and BJP along with the Supreme Court of India.
What is going on man? Is he possessed by someone?
Nevertheless, just look at how good he is at ripping establishments apart.
pic.twitter.com/chW7pCNeqG— Roshan Rai (@RoshanKrRaii) December 19, 2025
निष्कर्ष: Aravalli को बचाना सिर्फ पेड़-पहाड़ बचाना नहीं है, बल्कि उत्तर भारत को रेगिस्तान बनने से बचाना, करोड़ों लोगों को पानी और साफ हवा उपलब्ध कराना है। यह हमारी आने वाली पीढ़ियों को एक रहने लायक धरोहर सौंपने का सवाल है। विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास नहीं जिसकी कीमत हमें अपनी सांसों, अपने पानी और अपने भविष्य से चुकानी पड़े।
Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी सार्वजनिक रिपोर्ट्स, पर्यावरण विशेषज्ञों के बयानों और उपलब्ध शोध पर आधारित है। Aravalli Range Issue से जुड़ी नीतियां, परिभाषाएं और सरकारी निर्णय समय के साथ बदल सकते हैं। यह लेख केवल सामान्य सूचना और जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है।
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